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पुराने समय में जैसे ही सावन का आगमन होता था ,वैसे ही गांव में हर पेड़ पर झूले (Sawan ka Jhula) पड़ जाया करते थे| इतना ही नहीं शहरों में भी लोग झूले डाला करते थे| फिर सभी महिलाएं व लड़कियां झुंड बनाकर झूला झूलती थी| सावन के गीत गाती थी| सावन के महीने को बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाती थी|

पहले यह परम्परा थी कि सावन के आते ही शादीशुदा लड़कियां अपने मायके चली जाया करती थी और अपने मायके में रहकर झूला झूलने का आनंद लेती थी| लेकिन आजकल यह परम्परा भी खत्म सी होती जा रही है| अब लड़कियां व महिलाएं सावन के महीने में केवल एक दिन के लिए रक्षाबंधन पर ही अपने मायके जाती है और वापस अपने ससुराल लौट आती है| अब न तो सावन में झूला झूले जाते है और न ही सावन के गीत गाये जाते है|

अब सावन कब आता है और कब चला जाता है ,इसका पता भी नहीं चलता है| अब कोई भी पेड़ो पर झूला नहीं डालता है और न ही लड़कियां झुंड बनाकर सावन के गीत गाती है| आज के समय में लोगों को ये बाते समय की बर्बादी लगती है| लेकिन अपने कभी सोचा है कि ऐसा क्यों हो रहा है? लोग अपनी पुरानी परंपरा को क्यों भूलते जा रहे है? सावन में झूला झूलने की परम्परा क्यों खत्म सी होती जा रही है? क्या सावन में झूला डालने की परम्परा केवल इतिहास बनकर ही रह जाएगी?

इन सभी सवालों के जवाब जानने से पहले हम यह जान लेते है कि सावन में झूला क्यों झूलते है? और झूला झूलने से हमारे शरीर को क्या लाभ होता है?

सावन में क्यों झूलते है झूला (Sawan ka Jhula)?

कहा जाता है कि सावन के माह में ब्रज में भगवान श्रीकृष्ण ने राधा को झूला झुलाया था| तभी से सावन में झूला झूलने की परम्परा चली आ रही है|

सावन में झूला (Sawan ka Jhula) झूलने से लाभ

सावन में झूला झुलना वैसे तो एक बहुत पुरानी परम्परा है| जो कि राधा-कृष्ण के समय से चली आ रही है| सावन में झूला झुलना हमे आनंद व खुशी तो देता ही है ,इसके साथ-साथ यह हमारे शरीर के लिए फायदेमंद भी होता है| झूला झूलने से हमें बहुत से लाभ हो सकते है जैसे –

  • झूला झूलने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इससे हमारे शरीर का व्यायाम हो जाता है ,क्योंकि जब हम झूले की रस्सी को पकड़कर झूला झूलने की कोशिश करते है तो इससे हमारे हाथों व पैरों का व्यायाम हो जाता है| शरीर में अलग सी फुर्ती आ जाती है|
  • जैसा कि हम जानते है पेड़ो से हमे आक्सीजन मिलती है और जब हम इन पेड़ो पर झूला डालकर झूलते है तो हमारे शरीर में आक्सीजन का स्तर बढ़ जाता है जिसके कारण हमारा मानसिक तनाव कम हो जाता है|
  • जब आप झूला झूलते है तो आपके मन में खुशी की तरंगे उठती है जिसके कारण दिमाग में स्थित शेरोटोनिक व डोपामाइन नामक केमिकल्स तेजी से स्त्रवित होने लगता है और इसके स्त्राव से हमें आनंद की अनुभूति होती है|

क्यों कम हो रहा है सावन में झूले (Sawan ka Jhula) का महत्व ?

आज से लगभग 10-12 साल पहले तक गांव में लोग सावन के महीने में झूले डाला करते थे| लेकिन आज वर्तमान में गांव में भी झूला डालने की परंपरा लगभग खत्म सी होती जा रही है| अब गांव की लड़कियां पेड़ो पर झूला डालकर झूलना पसंद नहीं करती है और न ही सावन के गीत अपनी सहेलियों के संग गाती है|

आखिर इस बदलाव का कारण क्या है? ऐसा क्यों हो रहा है? अब सावन में झूला झूलने की परम्परा कम क्यों होती जा रही है? लड़कियां व महिलाएं अब पहले की तरह इस पर्व को क्यों नहीं मनाती है? जैसा हर्षोल्लास पहले हुआ करता था ,अब वैसा क्यों नहीं है? ऐसे बहुत सारे सवाल है जो हर किसी के मन में आते है|

तो दोस्तों आइए जानते है इस सब का कारण क्या है?

  • टेक्नालजी का आना – इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि हमारे जीवन में अधिक से अधिक टेक्नालजी का आना जैसे मोबाइल ,computer .टीवी ,इंटरनेट आदि| पहले के समय में इतनी ज्यादा टेक्नालजी नहीं हुआ करती थी| जिस कारण लोग समय व्यतीत करने के लिए एक दुसरे के साथ उठते बैठते थे| सभी लोग साथ में मिलकर बड़े उत्साह से त्यौहार मनाया करते थे| लेकिन आजकल लोग अपने अपने मोबइल में लगे रहते है| एक घर में रहकर भी किसी के पास एक दुसरे के साथ बैठने का समय नही मिलता है| तो वे सावन के झूले क्या झूलेंगे|
  • पेड़-पौधों की अधिक से अधिक कटाई होना – आजकल गांव हो या शहर सभी जगह पेड़-पौधों की संख्या कम होती जा रही है| लोग जंगल को काटकर हर जगह पर मकान बना रहे| जब पेड़ ही नहीं होंगे तो पेड़ो पर झूले कैसे डाले जायेंगे| इसलिए आप लोगों से अनुरोध है कि अपने घर के आसपास पेड़ जरुर लगाए ताकि हमारी जो सावन में झूला झूलने की परम्परा है वो खत्म न हो|
  • महिलाओं के प्रति बढते अपराध – आजकल जहाँ सुनो बस यही खबर होती है कि इस लड़की के साथ दुष्कर्म हुआ ,उस लड़की के साथ दुष्कर्म हुआ| महिलाओं व लड़कियों के प्रति बढते इन अपराधों के कारण उनके घर वाले उन्हें घर से बाहर जाने की आज्ञा कम देते है| उन्हें ऐसा लगता है कि लड़कियां बाहर की जगह घर में ज्यादा सुरक्षित है इसलिए अब गांव की महिलाएं व लड़कियां सावन में झूला झूलने के लिए भी कम जाती है|
  • प्रेमभाव की भावना का कम होना – पहले के समय में लोग दोस्ती हो या प्यार सभी रिश्ते बड़ी ही ईमानदारी के साथ निभाते थे| लेकिन अब लोग केवल मतलब के रिश्ते ही रखते है| लोगों के बीच का आपसी प्रेमभाव सब खत्म सा हो गया है| आजकल लोग केवल अपना परिवार ही चाहते है कोई किसी को सुखी नहीं देखना चाहता है| इसलिए शायद अब लोग सावन में भी साथ मिलकर झूला झूलना पसंद नहीं करते है|
  • व्यस्त दिनचर्या – आजकल पुरुष हो या महिलाएं सभी को पैसे कमाने ही इच्छा रहती है| जिस कारण उनकी दिनचर्या बहुत व्यस्त होती है ,वे लोग अपने जीवन में इतनी दौड़-धूप करते है कि उनके लिए सावन में झूला झूलने का समय निकाल पाना बहुत कठिन होता है| पहले के समय में महिलाएं व लड़कियां नौकरी बहुत कम किया करती थी जिस कारण वे हर एक त्यौहार और परम्परा को बहुत अच्छे से निभाती थी लेकिन अब किसी के पास भी इन सब चीजों के लिए समय नहीं है|

इन के अलावा ओर भी बहुत सारे कारण है जैसे – बच्चों पर पढाई का अधिक दबाव होना ,दिखावटीपन आना आदि| इन सब कारणों से लोग सावन में झूला झूलने की परम्परा को भूलते जा रहे है|

अगर आप चाहते है कि सावन में झूला (Sawan ka Jhula) झूलने की परम्परा पीढ़ी दर पीढ़ी बनी रहे तो हमें सावन के महीने में पेड़ो पर झूला डालकर जरुर झूलना चाहिए और साथ में अपने बच्चों को भी झुलाना चाहिए और इसके महत्व को बताना चाहिए ,ताकि आपके जाने के बाद आपके बच्चे इस परम्परा को जिंदा रख सके|

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