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जैसा की आप जानते ही होंगे की किसी भी देश की एकता और अखंडता का प्रतीक उसका राष्ट्रीय झंडा होता है. वैसे ही भारत देश की एकता का प्रतीक हमारा राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा है. भारत में सभी धर्मो के लोग रहते है, और सभी अपने राष्ट्रीय ध्वज को प्यार और सम्मान देते है. तो चलिए थोड़ा सा और जानने की कोशिश करते है अपने भारत के राष्ट्रीय ध्वज के बारे में.

भारत के राष्ट्रीय ध्वज में तीन रंगों का महत्व :
ये तीन रंगों केसरिया, सफेद और हरे रंग से बना है। जिसमें गहरा केसरिया (सबसे ऊपर), सफेद( बीच में) और हरा (सबसे नीचे)। देश के झंडे में शामिल तीनों रंगों का अपना अलग महत्व है। केसरिया रंग जहां शक्ति का प्रतीक है। वहीं सफेद रंग शांति को दर्शाता है। जबकि हरा रंग हरियाली और संपन्नता को दिखाता है। तिरंगे के बीच में बना चक्र राजा अशोक द्वारा सारनाथ में स्थापित सिंह के क्षेत्रफल के आधार पर बनाया गया है। जबकि झंडे के बीच में नीले रंग का चक्र होता है। नीले रंग का चक्र जीवन में गतिशीलता और इसकी तीलियां धर्म के 24 नियम बताती है। भारत के राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे के रंगों की तरह इसकी बनावट भी खास है। झंडे की लंबाई और चौड़ाई का अनुपात 2:3 होता है। जबकि चक्र की परिधि सफेद पट्टी के अंदर होती है।
इसमें मौजूद तीन रंग और अशोक चक्र का अपना अर्थ है जो इस प्रकार है:

भारत के राष्ट्रीय ध्वज में केसरिया रंग
भारत के राष्ट्रीय ध्वज का सबसे ऊपरी भाग केसरिया रंग है; जो बलिदान का प्रतीक है राष्ट्र के प्रति हिम्मत और नि:स्वार्थ भावना को दिखाता है। ये बेहद आम और हिन्दू, बौद्ध और जैन जैसे धर्मों के लिये धार्मिक महत्व का रंग है। केसरिया रंग विभिन्न धर्मों से संबंधित लोगों के अहंकार से मुक्ति और त्याग को इंगित करता है और लोगों को एकजुट बनाता है। केसरिया का अपना अलग महत्व है जो हमारे राजनीतिक नेतृत्व को याद दिलाता है कि उनकी ही तरह हमें भी किसी व्यक्तिगत लाभ की इच्छा के पूरे समर्पण के साथ राष्ट्र की भलाई के लिये काम करना चाहिये।

भारत के राष्ट्रीय ध्वज में सफेद रंग
भारत के राष्ट्रीय ध्वज के बीच का भाग सफेद रंग से डिज़ाइन किया गया है जो राष्ट्र की शांति, शुद्धता और ईमानदारी को प्रदर्शित करता है। भारतीय दर्शन शास्त्र के मुताबिक, सफेद रंग स्वच्छता और ज्ञान को भी दर्शाता है। राष्ट्र के मार्गदर्शन के लिये सच्चाई की राह पर ये रोशनी बिखेरता है। शांति की स्थिति को कायम रखने के दौरान मुख्य राष्ट्रीय उद्देश्य की प्राप्ति के लिये देश के नेतृत्व के लिये भारतीय राजनीतिक नेताओं का ये स्मरण कराता है।

भारत के राष्ट्रीय ध्वज में हरा रंग
भारत के तिरंगे के सबसे निचले भाग में हरा रंग है जो विश्वास, उर्वरता ; खुशहाली ,समृद्धि और प्रगति को इंगित करता है। भारतीय दर्शनशास्त्र के अनुसार, हरा रंग उत्सवी और दृढ़ता का रंग है जो जीवन और खुशी को दिखाता है। ये पूरे भारत की धरती पर हरियाली को दिखाता है। ये भारत के राजनीतिक नेताओं को याद दिलाता है कि उन्हें भारत की मिट्टी की बाहरी और आंतरिक दुश्मनों से सुरक्षा करनी है।

भारत के राष्ट्रीय ध्वज में अशोक चक्र और 24 तिलीयाँ
भारतीय झंडे के मध्य में अशोक चक्र होने के पीछे भी एक बड़ा इतिहास है। बहुत साल पहले, भगवान बुद्ध को मोक्ष की प्राप्ति हुई अर्थात गया में शिक्षा मिली। मोक्ष की प्राप्ति के बाद वो वाराणसी के सारनाथ आ गये जहाँ वो अपने पाँच अनुयायी (अर्थात् पाँच वर्जीय भिक्क्षु) कौनदिन्या, अश्वजीत, भद्रक, महानाम और कश्यप से मिले। धर्मचक्र की व्याख्या और वितरण कर बुद्ध ने उन सबको अपना पहला उपदेश दिया। इसे राजा अशोक द्वारा अपने स्तंभ के शिखर को प्रदर्शित करने के लिये लिया गया जो बाद में भारतीय ध्वज के केन्द्र में अशोक चक्र के रुप में इस चक्र के उत्पत्ति का आधार बना। राष्ट्रीय झंडे के बीच में अशोक चक्र की मौजूदगी राष्ट्र में मजबूत संबंध और बुद्ध में विश्वास को दिखाता है।

12 तिलीयाँ भगवान बुद्ध के अध्यापन को बताता है जबकि दूसरी 12 तिलीयाँ अपने बराबर की प्रतीकों के साथ जोड़ें में है जैसे-अविध्या (अर्थात् ज्ञान की कमी), सम्सकारा (अर्थात् आकार देने वाला), विजनाना (अर्थात् चेतना), नमरुपा (अर्थात् नाम और रुप), सदायातना ( अर्थात् छ: इन्द्रिय जैसे- कान, आँख, जीभ, नाक, शरीर और दिमाग), स्पर्श (अर्थात् संपर्क), वेदना ( अर्थात् दर्द), तृष्णा (अर्थात् प्यास), उपदना (अर्थात् समझना), भाव (अर्थात् आने वाला), जाति (अर्थात् पैदा होना), जरामरना (अर्थात् वृद्धावस्था), और मृत्यु।

भारत के राष्ट्रीय ध्वज में अशोक चक्र नीले रंग में क्यों है ?
राष्ट्रीय ध्वज के सफेद पट्टी के केन्द्र में अशोक चक्र का नीला रंग, ब्रह्माण्ड की सच्चाई को दिखाता है। ये आकाश और समुद्र के रंग को भी प्रदर्शित करता है।

भारत के राष्ट्रीय ध्वज में 24 तिलियाँ क्या प्रदर्शित करती है?
हिन्दू धर्म के अनुसार, राष्ट्रीय ध्वज की सभी 24 तिलीयाँ जीवन को दर्शाती है अर्थात् धर्म जो इस प्रकार है: प्रेम, बहादुरी, धैर्य, शांति, उदारता, अच्छाई, भरोसा, सौम्यता, नि:स्वार्थ भाव, आत्म-नियंत्रण, आत्म बलिदान, सच्चाई, नेकी, न्याय, दया, आकर्षणशीलता, नम्रता, हमदर्दी, संवेदना, धार्मिक ज्ञान, नैतिक मूल्य, धार्मिक समझ, भगवान का डर और भरोसा।

झंडे का इतिहास :
पिंगलि वेंकैया नाम के शख्स ने भारत की आजादी के प्रतीक तिरंगे को डिजाइन किया था जो बाद में राष्ट्रीय ध्वज बना। देश की आजादी में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने कहा था, ‘व्यक्ति मर सकता है लेकिन विचार नहीं।’ पिंगलि वेंकैया गुमनामी में जिंदगी जीते हुए इस दुनिया को विदा कह गए, लेकिन उनका दिया हुआ राष्ट्रीय ध्वज आज हर भारतीय की शान है।

पिंगलि का जन्म आंध्र प्रदेश के कृष्णा जिले में 2 अगस्त 1878 को हुआ था। उन्हें कई भाषाओं का ज्ञान था और वे भूगर्भशास्त्री भी थे। उन्हें अपनी मातृभाषा के अलावा जापानी, उर्दू और संस्कृत जैसी भाषाएं भी आती थीं। उन्होंने अपनी शुरुआती शिक्षा एक प्राइमरी स्कूल से की थी, जिसके बाद आगे की पढ़ा के लिए वे मछिलिपत्नम गए। पढ़ाई खत्म करने के बाद वे आजादी के आंदोलन में कूद पड़े। वे नेतादी सुभाषचंद्र बोस से काफी प्रभावित थे, जिसकी वजह से उन्होंने इंडियन आर्मी जॉइन की और अफ्रीका में बोर युद्ध में हिस्सा लिया।

काकीनाड़ा में आयोजित भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशन के दौरान वेंकैया ने भारत का खुद का राष्ट्रीय ध्वज होने की आवश्यकता पर बल दिया और, उनका यह विचार गांधी जी को बहुत पसन्द आया। गांधी जी ने उन्हें राष्ट्रीय ध्वज का प्रारूप तैयार करने का सुझाव दिया।

पिंगली वैंकया ने पांच सालों तक तीस विभिन्न देशों के राष्ट्रीय ध्वजों पर शोध किया और अंत में तिरंगे के लिए सोचा। 1921 में विजयवाड़ा में आयोजित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में वैंकया पिंगली महात्मा गांधी से मिले थे और उन्हें अपने द्वारा डिज़ाइन लाल और हरे रंग से बनाया हुआ झंडा दिखाया। इसके बाद ही देश में कांग्रेस पार्टी के सारे अधिवेशनों में दो रंगों वाले झंडे का प्रयोग किया जाने लगा लेकिन उस समय इस झंडे को कांग्रेस की ओर से अधिकारिक तौर पर स्वीकृति नहीं मिली थी।

इस बीच जालंधर के हंसराज ने झंडे में चक्र चिन्ह बनाने का सुझाव दिया। इस चक्र को प्रगति और आम आदमी के प्रतीक के रूप में माना गया। बाद में गांधी जी के सुझाव पर पिंगली वेंकैया ने शांति के प्रतीक सफेद रंग को भी राष्ट्रीय ध्वज में शामिल किया। 1931 में कांग्रेस ने कराची के अखिल भारतीय सम्मेलन में केसरिया, सफ़ेद और हरे तीन रंगों से बने इस ध्वज को सर्वसम्मति से स्वीकार किया। बाद में राष्ट्रीय ध्वज में इस तिरंगे के बीच चरखे की जगह अशोक चक्र ने ले ली। झंडे को राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाने के लिए डॉ. राजेंद्र प्रसाद के नेतृत्व में एक कमेटी का गठन किया गया। भारतीय संविधान सभी में इसे 22 जुलाई 1947 को राष्ट्रीय ध्वज के तौर पर स्वीकृति मिली।

भारतीय तिरंगे का विकास:
यह ध्वज भारत की स्वतंत्रता के संग्राम काल में निर्मित किया गया था। वर्ष 1848 में स्वतंत्रता के पहले संग्राम के समय भारत राष्ट्र का ध्वज बनाने की योजना बनी थी, लेकिन वह आंदोलन असमय ही समाप्त हो गया था और उसके साथ ही वह योजना भी बीच में ही अटक गई थी। वर्तमान रूप में पहुंचने से पूर्व भारतीय राष्ट्रीय ध्वज अनेक पड़ावों से गुजरा है। कुछ ऐतिहासिक पड़ाव इस प्रकार हैं

ऐसा कहा जाता है, कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) के ग्रीन पार्क (पारसी बागान स्क्वैयर) में 7 अगस्त 1906 में राष्ट्रीय झंडे को फहराया गया। यह 1904 में स्वामी विवेकानंद की शिष्या भगिनी निवेदिता द्वारा बनाया गया था। 7 अगस्त, 1906 को पारसी बागान चौक (ग्रीन पार्क) कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) में इसे कांग्रेस के अधिवेशन में फहराया गया था। इस ध्वज को लाल, पीले और हरे रंग की क्षैतिज पट्टियों से बनाया गया था। ऊपर की ओर हरी पट्टी में आठ कमल थे और नीचे की लाल पट्टी में सूरज और चाँद बनाए गए थे। बीच की पीली पट्टी पर वंदेमातरम् लिखा गया था।

द्वितीय ध्वज को पेरिस में मैडम कामा और 1907 में उनके साथ निर्वासित किए गए कुछ क्रांतिकारियों द्वारा फहराया गया था। कुछ लोगों की मान्यता के अनुसार यह 1905 में हुआ था। यह भी पहले ध्वज के समान था; सिवाय इसके कि इसमें सबसे ऊपर की पट्टी पर केवल एक कमल था, किंतु सात तारे सप्तऋषियों को दर्शाते थे। यह ध्वज बर्लिन में हुए समाजवादी सम्मेलन में भी प्रदर्शित किया गया था।


1917 में भारतीय राजनैतिक संघर्ष ने एक निश्चित मोड़ लिया। डॉ॰ एनी बीसेंट और लोकमान्य तिलक ने घरेलू शासन आंदोलन के दौरान तृतीय चित्रित ध्वज को फहराया। इस ध्वज में 5 लाल और ४ हरी क्षैतिज पट्टियां एक के बाद एक और सप्ततऋषि के अभिविन्यास में इस पर सात सितारे बने थे। ऊपरी किनारे पर बायीं ओर (खंभे की ओर) यूनियन जैक था। एक कोने में सफेद अर्धचंद्र और सितारा भी था।

कांग्रेस के 1921 सत्र बेजवाड़ा (वर्तमान विजयवाड़ा) में किया गया यहाँ आंध्र प्रदेश के एक युवक पिंगली वैंकैया ने एक झंडा बनाया और गांधी जी को दिया। यह दो रंगों का बना था। लाल और हरा रंग जो दो प्रमुख समुदायों अर्थात हिन्दू और मुस्लिम का प्रतिनिधित्वं करता है। गांधी जी ने सुझाव दिया कि भारत के शेष समुदाय का प्रतिनिधित्व करने के लिए इसमें एक सफेद पट्टी और राष्ट्र की प्रगति का संकेत देने के लिए एक चलता हुआ चरखा होना चाहिए।

वर्ष 1931 तिरंगे के इतिहास में एक स्मरणीय वर्ष है। तिरंगे ध्वज को भारत के राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाने के लिए एक प्रस्ताव पारित किया गया और इसे राष्ट्र-ध्वज के रूप में मान्यता मिली। यह ध्वज जो वर्तमान स्वरूप का पूर्वज है, केसरिया, सफेद और मध्य में गांधी जी के चलते हुए चरखे के साथ था। यह भी स्पष्ट रूप से बताया गया था कि इसका कोई साम्प्रदायिक महत्त्व नहीं था।


22 जुलाई 1947 को संविधान सभा ने वर्तमान ध्वज को भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाया। स्वतंत्रता मिलने के बाद इसके रंग और उनका महत्व बना रहा। केवल ध्वज में चलते हुए चरखे के स्थान पर सम्राट अशोक के धर्म चक्र को स्थान दिया गया। इस प्रकार कांग्रेस पार्टी का तिरंगा ध्वज अंतत: स्वतंत्र भारत का तिरंगा ध्वज बना।


26 जनवरी 2002 में ध्वज संहिता में संशोधन
संविधान सभा में स्वीकृति मिलने के बाद सबसे पहला राष्ट्रीय ध्वज 16 अगस्त 1947 को लाल किले पर फहराया गया। झंडे को पंडित जवाहर लाल नेहरू ने फहराया था। पहले राजकीय जगहों के अतिरिक्त किसी और स्थान पर राष्ट्रीय ध्वज फहराने की अनुमति नहीं थी। बाद में 26 जनवरी 2002 में ध्वज संहिता में संशोधन किया गया। इसके तहत भारतीय नागरिक घरों, कार्यालयों और फैक्टरियों में कभी भी राष्ट्रीय ध्वज फहरा सकते हैं।
राष्ट्रीय प्रतीक से संबंधित कानून के साथ ही भारतीय ध्वज की प्रथा (किसी दूसरे राष्ट्र या ग़ैर राष्ट्रीय ध्वज) को भारत का राष्ट्रीय ध्वज नियमावली संचालित करता है। किसी भी निजी नागरिक (किसी भी राष्ट्रीय दिवस को छोड़कर) के द्वारा राष्ट्रीय ध्वज का इस्तेमाल पूरी तरह प्रतिबंधित है। जबकि, नवीव जिंदल (निजी नागरिक) के अनुरोध पर 2002 में, सुप्रिम कोर्ट के आदेशानुसार भारत की सरकार (भारत की केन्द्रीय कैबिनेट) द्वारा ध्वज के सीमित उपयोग के कानून में बदलाव किया गया। ध्वज के अतिरिक्त इस्तेमाल के लिये 2005 में इसमें दुबारा बदलाव किया गया।

तिरंगे को फहराने के नियम या झंडे का उचित प्रयोग
सन 2002 से पहले, भारत की आम जनता के लोग केवल गिने चुने राष्ट्रीय त्योहारों को छोड़ सार्वजनिक रूप से राष्ट्रीय ध्वज फहरा नहीं सकते थे। एक उद्योगपति, नवीन जिंदल ने, दिल्ली उच्च न्यायालय में, इस प्रतिबंध को हटाने के लिए जनहित में एक याचिका दायर की। जिंदल ने जान बूझ कर, झंडा संहिता का उल्लंघन करते हुए अपने कार्यालय की इमारत पर झंडा फहराया। ध्वज को जब्त कर लिया गया और उन पर मुकदमा चलाने की चेतावनी दी गई। जिंदल ने बहस की कि एक नागरिक के रूप में मर्यादा और सम्मान के साथ झंडा फहराना उनका अधिकार है और यह एक तरह से भारत के लिए अपने प्रेम को व्यक्त करने का एक माध्यम है।[ तदोपरांत केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने, भारतीय झंडा संहिता में 26 जनवरी 2002 को संशोधन किए जिसमें आम जनता को वर्ष के सभी दिनों झंडा फहराने की अनुमति दी गयी और ध्वज की गरिमा, सम्मान की रक्षा करने को कहा गया।
भारतीय संघ में वी.यशवंत शर्मा के मामले में कहा गया कि यह ध्वज संहिता एक क़ानून नहीं है, संहिता के प्रतिबंधों का पालन करना होगा और राष्ट्रीय ध्वज के सम्मान को बनाए रखना होगा। राष्ट्रीय ध्वज को फहराना एक पूर्ण अधिकार नहीं है, पर इस का पालन संविधान के अनुच्छेद 51-A के अनुसार करना होगा।

झंडे का सम्मान
भारतीय कानून के अनुसार ध्वज को हमेशा ‘गरिमा, निष्ठा और सम्मान’ के साथ देखना चाहिए। “भारत की झंडा संहिता-2002″, ने प्रतीकों और नामों के (अनुचित प्रयोग निवारण) अधिनियम, 1950” का अतिक्रमण किया और अब वह ध्वज प्रदर्शन और उपयोग का नियंत्रण करता है। सरकारी नियमों में कहा गया है कि झंडे का स्पर्श कभी भी जमीन या पानी के साथ नहीं होना चाहिए। उस का प्रयोग मेज़पोश के रूप में, या मंच पर नहीं ढका जा सकता, इससे किसी मूर्ति को ढका नहीं जा सकता न ही किसी आधारशिला पर डाला जा सकता था। सन 2005 तक इसे पोशाक के रूप में या वर्दी के रूप में प्रयोग नहीं किया जा सकता था। पर 5 जुलाई 2005, को भारत सरकार ने संहिता में संशोधन किया और ध्वज को एक पोशाक के रूप में या वर्दी के रूप में प्रयोग किये जाने की अनुमति दी। हालांकि इसका प्रयोग कमर के नीचे वाले कपडे के रूप में या जांघिये के रूप में प्रयोग नहीं किया जा सकता है। राष्ट्रीय ध्वज को तकिये के रूप में या रूमाल के रूप में करने पर निषेध है। झंडे को जानबूझकर उल्टा, रखा नहीं किया जा सकता, किसी में डुबाया नहीं जा सकता, या फूलों की पंखुडियों के अलावा अन्य वस्तु नहीं रखी जा सकती। किसी प्रकार का सरनामा झंडे पर अंकित नहीं किया जा सकता है।

भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के बारे में महात्मा गाँधी के विचार

“सभी राष्ट्रों के लिये ध्वज जरुरी है। लाखों इसके लिये कुर्बान हुए। इसमें कोई शक नहीं कि एक प्रकार की मूर्तिपूजा है जो पाप का नाश करने के लिये होगी। ध्वज आदर्श को प्रस्तुत करता है। यूनियन जैक का फहराना अंग्रेजी अन्त:-करण भावनाओं को उत्पन्न करता है जिसकी मजबूती को मापना कठिन है। अमेरिकन के लिये सितारे और पट्टी एक दुनिया है। इस्लाम में सर्वोच्च बहादुरी सितारों और अर्धचन्द्र को आगे ले जाना है”

“ये हमारे लिये जरुरी है कि भारतीय मुस्लिम, ईसाई, यहूदी, पारसी और उन सभी के लिये जो भारत को अपना घर मानते है एक ध्वज के लिये जीयें और मरें। ”-महात्मा गाँधी

भारतीय राष्ट्रीय ध्वज से संबंधित भाव
मै तब हाई स्कूल में था जब पंडित नेहरु ने नई दिल्ली में झंडा फहराया था- ए.पी.जे.अब्दुल कलाम
“शांति और समरसता में जीने के लिये, एकता और मजबूती, के साथ हमें एक लोग, एक राष्ट्र और एक ध्वज को मानना चाहिये।“- पॉलिन हैंसन
“मेरा मानना है कि हमारा ध्वज कपड़े और स्याही से कुछ ज्यादा है। ये विश्वभर में पहचाने जाने वाला प्रतीक है जो उदारता और आजादी के लिये खड़ा होता है। ये हमारे राष्ट्र का इतिहास है, और ये उनके खून से लिखा हुआ है जो इसे बचाने मे शहीद हुए।“- जॉन थुने
“हमारा ध्वज बहुत राजनीतिक विचारों में केवल एक नहीं है, बल्कि, ये हमारी राष्ट्रीय एकता की पहचान है।”- एंड़्रियन क्रोनाउर
“हमारा ध्वज उनका सम्मान करता है जो इसकी सुरक्षा के लिये लड़ते है, और हमारे राष्ट्र के निर्माणकर्ताओं के बलिदान को याद दिलाता है। अमेरिका के ऐतिहासिक कहानियों के सर्वश्रेष्ठ प्रतिरुप के रुप में इस राष्ट्र के सबसे उत्कृष्ठ सितारों और पट्टीयों को प्रदर्शित करते है। ”- जो बार्टोन
“क्या बची हुई उम्मीद है लोगों की ? एक देश, एक भाषा, एक ध्वज! ”- एलेक्जेंडर हेनरिक
“एक देशभक्त और नागरिक होने से ज्यादा ध्वज को उठाना और संकल्प लेने में है।”- जेसे वेनचुरा
“र्निदोष लोगों की हत्या के शर्म को ढ़कने के लिये कोई भी बड़ा ध्वज कम पड़ जाएगा। ”-हॉवर्ड जिन्न
“ध्वज को लहराने में देशभक्ति नहीं होती, लेकिन इस प्रयास में कि हमारा देश अवश्य ईमानदार और मजबूत होना चाहिये।”- जेम्स ब्रिस
“हम अपना सिर! और हमारा दिल! देते है अपने देश को! एक देश! एक भाषा! एक ध्वज! ”-कर्नल जॉर्ज.टी.बाल्क
“दिलों का संयोजन, हाथों का मिलन और एकता का ध्वज हमेशा के लिये। ”- जार्ज पोप मॉरिस
“चलिये एक ही ध्वज के तहत जन्म ले जिसमें हम हर आवश्यकता में रैली करें, हमारा एक देश है, एक संविधान है, एक किस्मत है। ”- डेनियल वेबस्टर
“हमारे पास केवल एक ध्वज है, एक देश है; चलिये एक साथ होते है। हमलोग रंगों में अलग हो सकते है लेकिन भावनाओं में नहीं। बहुत कुछ मेरे बारे कहा गया है जो गलत है और जो श्वेत और काले लोग यहाँ है, जो कि शुरु से अंत तक युद्ध में मेरे साथ रहे, मेरा खंडन कर सकते है। ”- नॉथन बेडफोर्ड फौरेस्ट

 

 

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