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मोती एक बहुत ही सुंदर रत्न हैं| इसका उपयोग आभूषण बनाने और साज-सजावट के लिए किया जाता हैं| वेद तथा पुराण जैसे प्राचीन ग्रंथों में मोती के बारे मे बताया गया हैं| रामायण के समय में भी मोती का प्रयोग काफी प्रचलित था| क्योकि लंका से लौटने के बाद जब भगवान श्रीराम का राज्याभिषेक हुआ तो वायुदेव ने मोतियों की माला उन्हें उपहार स्वरूप दी थी| इसके साथ-साथ मोती की चर्चा बाइबिल में भी की गयी हैं साढ़े तीन हजार वर्ष ईसा पूर्व अमेरिका के मूल निवासी रेड इंडियन मोती को बहुत महत्त्व देते थे| उनका मानना था कि मोती में जादुई शक्ति छिपी हुई है ईसा बाद छठी शताब्दी में प्रसिद्ध भारतीय विद्वान वराहमिहिर ने अपने द्वारा लिखित ‘बृहतसंहिता’ के ‘मुक्ता लक्षणाध्याय’ में मोतियों का विस्तृत विवरण दिया है|
लेकिन क्या आप जानते है क़ि इस सुंदर रत्न की प्राप्ति ह्मे कैसे होती है? और ये कहाँ से प्राप्त होता है? आज ह्म आप को इसके बारे मे ही बताएँगे कि मोती ह्मे किस प्रकार मिलता है|
प्राकृतिक रूप से एक मोती का निर्माण तब होता है जब कोई बाहरी कण जैसे रेत, कीट आदि किसी सीप के अंदर प्रवेश करते हैं और सीप उस कण को बाहर नहीं निकाल पाता, बजाय उसके ऊपर चमकदार परतें जमा होती जाती है| और इस प्रकार ह्मे एक चमकदार मोती प्राप्त होता है| यह कैल्शियम कार्बोनेट, जैपिक पदार्थों व पानी से बना होता है| इसी आसान तरीके को मोती उत्पािदन में भी इस्ते माल किया जाता है|
मोती तीन प्रकार के होते हैं-
1. केवीटी – ये वे मोती होते है जो सीप के अंदर ऑपरेशन के जरिए फारेन बॉडी डालकर मोती तैयार किये जाते है इसका उपयोग अंगूठी और लॉकेट बनाने में होता है| चमकदार होने के कारण एक मोती की कीमत हजारों रुपए में होती है|
2. गोनट – ये मोती प्राकृतिक रूप से गोल आकार का मोती होता है| यह मोती चमकदार व सुंदर होता होता है| इस एक मोती की कीमत आकार व चमक के अनुसार 1 हजार से 50 हजार तक होती है|
3. मेंटलटीसू – इस मोती को तैयार करने मे सीप के अंदर सीप की बॉडी का हिस्सा ही डाला जाता है| इस मोती का उपयोग खाने के पदार्थों जैसे मोती भस्म, च्यवनप्राश व टॉनिक बनाने में होता है| बाजार में इसकी सबसे ज्यादा मांग होती है|
प्राकृतिक तरीके से मोती (मोती की खेती) का निर्माण -:
प्राकृतिक मोती का निर्माण प्राकृतिक ढंग से ही होती है| वराह मिहिर की बृहत्संहिता में बताया गया है कि प्राकृतिक मोती की उत्पत्ति सीप, सर्प के मस्तक, मछली, सुअर तथा हाथी एवं बांस से होती है| परंतु अधिकांश प्राचीन भारतीय विद्वानों ने मोती की उत्पत्ति सीप से ही बताई है| प्राचीन भारतीय विद्वानों का मत था कि जब स्वाति नक्षत्र के दौरान वर्षा की बूंदें सीप में पड़ती हैं तो मोती का निर्माण होता है| इस ऋतु के दौरान जब वर्षा की बूंद या बालू का कण किसी सीप के अंदर घुस जाता है तो सीप उस बाहरी पदार्थ के प्रतिकाल हेतु नैकर का स्राव करती है| यह नैकर उस कण के ऊपर परत दर परत चढ़ता जाता है और इस प्रकार एक चमकदार मोती का निर्माण होता है| मोती वस्तुत: मोलस्क जाति के एक प्राणी द्वारा क्रिस्टलीकरण की प्रक्रिया द्वारा बनता है| यह उसी पदार्थ से बनता है जिस पदार्थ से मोलस्क का कवच या आवरण बनता है| यह पदार्थ कैल्शियम कार्बोनेट व एक अन्य पदार्थ का मिश्रण है| और इसे ही नैकर कहा जाता है| हर वह मोलस्क, जिसमें यह आवरण मौजूद होता है, उसके अंदर मोती उत्पन्न करने की क्षमता होती है| नैकर स्राव करने वाली कोशिकाएं इसके आवरण या एपिथोलियम में उपस्थित रहती हैं|
कृत्रिम तरीके से मोती का निर्माण -:
कृत्रिम तरीके से जो मोती निर्मित होता है उसे कृत्रिम मोती कहते है| इस मोती को संवर्धित (कल्चर्ड) मोती भी कहा जाता है| इस मोती के उत्पादन की प्रक्रिया को मोती की खेती का नाम दिया गया है| उपलब्ध साक्ष्यों से पता चलता है कि मोती की खेती सर्वप्रथम चीन में शुरू की गई थी| ईसा बाद 13वीं शताब्दी में चीन के हू चाऊ नामक नगर के एक निवासी चिन यांग ने गौर किया कि मीठे पानी में रहने वाले सीपी में यदि कोई बाहरी कण प्रविष्ट करा दिया जाए तो मोती-निर्माण की प्रक्रिया शुरू हो जाती है| इस विधि में सर्वप्रथम एक सीपी ली जाती है तथा उसमें कोई बाहरी कण प्रविष्ट करा दिया जाता है| फिर उस सीपी को वापस उसके स्थान पर रख दिया जाता है| इस प्रकार उस सीपी में मोती निर्माण की प्रक्रिया शुरू हो जाती है|
मोती की खेती के लिए सबसे अनुकूल मौसम शरद ऋतु यानी अक्टूबर से दिसंबर तक का समय माना गया है| मोती संवर्धन के लिए 0.4 हेक्टेयर जैसे छोटे तालाब में अधिकतम 25000 सीप से मोती उत्पादन किया जा सकता है| खेती शुरू करने के लिए किसान को सबसे पहले तालाब, नदी आदि से सीपों को इकट्ठा करना होता है या फिर इन्हे खरीदा भी जा सकते है| इसके बाद प्रत्येक सीप में छोटी-सी शल्य क्रिया के उपरान्त इसके भीतर 4 से 6 मिली मीटर व्यास वाले साधारण या डिजायनदार बीड जैसे गणेश, बुद्ध, पुष्प आकृति आदि डाले जाते है| इसके बाद सीप को बंद किया जाता है| और फिर इन सीपों को नायलॉन बैग में 10 दिनों तक एंटी-बायोटिक और प्राकृतिक चारे पर रखा दिया जाता है| और फिर इसका रोजाना निरीक्षण किया जाता है और मृत सीपों को हटा लिया जाता है| इसके बाद इन सीपों को तालाबों में डाल दिया जाता है| इसके लिए इन्हें नायलॉन बैगों में रखकर (दो सीप प्रति बैग) बाँस या पीवीसी की पाइप से लटका दिया जाता है और तालाब में एक मीटर की गहराई पर छोड़ दिया जाता है| प्रति हेक्टेरयर 20 हजार से 30 हजार सीप की दर से इनका पालन किया जा सकता है| इसके बाद अन्दर से निकलने वाला पदार्थ नाभिक के चारों ओर जमने लगता है जो अन्त में यह मोती का रूप ले लेता है ओर इस प्रकार लगभग 8-10 माह बाद सीप को चीर कर मोती निकाल लिया जाता है| प्राकृतिक और आर्टिफिशल दोनों ही तरीके के मोती बनाने के तरीके में एक चीज़ समान है| वह यह है कि इन दोनों को मीठे व खारे पानी में रखा जाता है| पानी का चुनाव सीपी में इस्तेमाल की जाने वाली मसल पर निर्धारित होता है|
प्राकृतिक मोतियों का केंद्र बहुत सूक्ष्मम होता है जबकि बाहरी सतह मोटी होती है| यह आकार में छोटा होता और इसकी आकृति बराबर नहीं होती| परन्तु पैदा किया हुआ मोती भी प्राकृतिक मोती की ही तरह होता है, बस अंतर इतना होता है कि उसमें मानवीय प्रयास शामिल होता है जिसमें इच्छित आकार, आकृति और रंग का इस्तेहमाल किया जाता है| भारत में आमतौर पर सीपों की तीन प्रजातियां पाई जाती हैं- लैमेलिडेन्स मार्जिनालिस, एल.कोरियानस और पैरेसिया कोरुगाटा जिनसे अच्छीा गुणवत्ताध वाले मोती पैदा किए जा सकते है|
मोती का उपयोग -:
वैसे तो मोती का उपयोग आभूषण बनाने मे किया जाता है| लेकिन इसके अलावा भी मोती के बहुत सारे उपयोग है जैसे-
1. साज-सजावट की वस्तु बनाने मे भी मोती का उपयोग किया जाता है|
2. अनेक प्रकार के आभूषण बनाने मे|
3. भस्म, च्यवनप्राश व टॉनिक बनाने में भी मोती का उपयोग होता है|

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