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क्या आपको लगता है जो आपको दिख रहा है वही सच है तो ऐसा नहीं है क्युकी आपको विश्वास नहीं होगा जानकार की इस धरती पर कुछ लोग बहुत पुराने काल से आध्यात्मिक जीवन जी रहे है ये बिलकुल अद्भुत अविश्वसनीय अकल्पनीय तो है ही पर एक दम सत्य और प्रमाणित है ” श्री सिद्द महावतार बाबा जी” जो की 5000 से 6000 वर्ष से  आज भी जीवित है.

महावतार बाबाजी - Autobiography of a Yogi नामक पुस्तक से एक चित्र, जिसे योगानन्द जी ने स्वयं की ब्बाजी से हुई एक भॆंट के स्मरण के आधार पर बनाया था।
महावतार बाबाजी – Autobiography of a Yogi नामक पुस्तक से एक चित्र, जिसे योगानन्द जी ने स्वयं की ब्बाजी से हुई एक भॆंट के स्मरण के आधार पर बनाया था। Source : Wiki 

जिसने जब भी उनको देखा एक ही उम्र बताई. लाहिड़ी महाराज ने बताया था कि उनकी शिष्य मंडली में दो अमेरिकी शिष्य भी थे। वे अपनी पूरी शिष्य मंडली के साथ कहीं भी कभी भी पहुंच जाया करते थे। महावतार बाबा जी की गुफा आज भी उत्तराखंड के अल्मोरा जिले में कुक्चिना से 13 लोमीटर की दूरी पर दूनागिरी में स्थित है.

  • जन्म का नाम : नागराजन
  • जन्म समय : ३० नवम्बर २०३ ई.
  • परान्गीपेट्टै, तमिल नाडु, भारत
  • गुरु/शिक्षक :  बोगर

इस भारतीय संत को लाहिड़ी महाशय और उनके अनेक चेलों ने महावतार बाबाजी का नाम दिया। इन भेंटों में से कुछ का वर्णन परमहंस योगानन्द ने अपनी पुस्तक “एक योगी की आत्मकथा 1946” में किया है इसमें योगानन्द की महावतार बाबाजी के साथ स्वंय की भेट का प्रत्यक्ष वर्णन भी शामिल है। उन्होंने बताया कि किस प्रकार हिमालय में रहते हुए बाबाजी ने सदियों से आध्यात्मिक लोगों का मार्गदर्शन किया है। बाबाजी सिद्ध हैं जो साधारण मनुष्य कि सीमाओं को तोड़ कर समस्त मानव मात्र के आध्यात्मिक विकास के लिए चुपचाप काम कर रहे हैं। बाबाजी ने ही आदि शंकराचार्य और संत कबीर को दीक्षा दी थी। जब स्वामी योगानंद उनसे मिले थे तब वो सिर्फ उनको 19 साल के नजर आ रहे थे, योगानंद महाराज ने किसी के मदद से उनका एक चित्र भी बनवाया था, ऐसे बहुत से लोग है जो समय समय अथवा काल दर काल महावतार बाबा जी से मिलते रहे है.

परमहंस योगानंद ने अपनी पुस्तक में बाबाजी से जुड़ी दो घटनाओं का उल्लेख किया है जिनपर एक बार तो भरोसा नहीं होता।

ऐसे टाल दी शिष्य की मृत्यु :
पहली घटना का उल्लेख करते हुए योगानंद ने लिखा है कि एक बार रात में बाबाजी अपने शिष्यों के साथ थे। पास ही में अग्नि जल रही थी। बाबाजी ने उस अग्नि से एक जलती हुई लकड़ी उठाकर अपने एक शिष्य के कंधे पर मार दी। जलती हुई लकड़ी से इस तरह मारे जाने पर बाबाजी के शिष्यों ने विरोध किया। इस पर बाबाजी ने उस शिष्य के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा कि मैंने तुम्हें कोई कष्ट नहीं पहुंचाया है बल्कि आज होने वाली तुम्हारी मृत्यु को टाल दिया है।
मृतक यूं जिंदा हो गया :
इसी तरह जो दूसरी बात का उल्लेख योगानंद ने किया है, उसके अनुसार एक बार बाबाजी के पास एक व्यक्ति आया और वह जोर-जोर से उनसे दीक्षा देने की जिद करने लगा। बाबाजी ने जब मनाकर दिया तो उसने पहाड़ से नीचे कूद जाने की धमकी दी। इसपर बाबाजी ने कहा ‘कूद जाओ’, उस शख्स ने आव देखा न ताव पहाड़ी से कूद गया। यह दृश्य देख वहां मौजूद लोग अचंभित रह गए। तब बाबाजी ने शिष्यों से कहा- ‘पहाड़ी से नीचे जाओ और उसका शव लेकर आओ।’ शिष्य पहाड़ी से नीचे गए और क्षत-विक्षत शव लेकर आ गए। शव को बाबाजी के सामने रख दिया। बाबाजी ने शव के ऊपर जैसे ही हाथ रखा, वह मरा हुआ व्यक्ति सही सलामत जिंदा हो गया। इसके बाद बाबाजी ने उससे कहा कि ‘आज से तुम मेरी टोली में शामिल हो गए। तुम्हारी ये अंतिम परीक्षा थी।’

लगभग 30 वर्ष पहले भी उन्होंने योगानंद के ही गुरु श्री युक्तेश्वर गिरी को दीक्षा दी। एक और प्रत्यक्ष वर्णन श्री युक्तेश्वर गिरि ने अपनी पुस्तक “द होली साईंस” में दिया था। योगानंद ने 10 वर्ष अपने इन्ही गुरु युक्तेश्वर गिरी के साथ बिताए, जिसके बाद स्वयं बाबाजी ने उनके सामने प्रकट होकर उन्हें क्रिया योग के इस दिव्य ज्ञान को पाश्चात्य देशों में ले जाने का निर्देश दिया।

मुख्य चेलो में श्यामाचरण लाहिड़ी जी भी है जो 1861 में महावतार बाबा जी से रानी खेत में मिले थे, जब लाहिड़ी महाशय को ब्रिटिश सरकार के लेखाकार के रूप में नौकरी पर रानीखेत तैनात कर दिया गया था। एक दिन रानीखेत से ऊपर दूनागिरी की पहाड़ियों में घूमते समय उसने किसी को अपना नाम पुकारते सुना. आवाज़ के पीछे-पीछे ऊपर पहाड़ पर चलते हुए उनकी मुलाकात “एक ऊंचे कद के तेजस्वी साधु” से हुई। वह यह जानकर चकित थे की साधु को उनका नाम पता है। यह साधु महावतार बाबाजी थे।

लाहिरी महाशय के अनेक शिष्यों ने भी यह कहा कि उन्होंने बाबाजी से मुलाकात की। एक दूसरे के साथ चर्चा के माध्यम से और यह तथ्य कि इनमें से कुछ भेंटों के दो या दो से अधिक गवाह थे, उन्होंने पुष्टि की है कि जिस व्यक्ति को देखा था वह वही साधु था जिसे लाहिरी ने महावतार बाबाजी कहा था।

अब हम अगर बनारस की बंगाली टोली की गलियों के बारे में बात करे तो आज वहाँ लाहिड़ी महाशय का घर आज भी है, आज भी आप उनकी असली चरण पादुकाये रखी हुयी देख सकते है. लाहिड़ी महाशय के घर में आज भी बाबा जी की समाधी की ‘जो की उसी गुफा से लायी गयी मिटटी के अंश से बनी हुयी है, जहाँ वो महावातर बाबा जी को पहली बार मिले थे’ १३० साल बाद भी पूजा पाठ निरंतर होती है. उस घर में आज कोई परिवार नहीं रहता है हा उसमे मंदिर की तरह पूजा होती रहती है, उस घर के पास में ही श्यामाचरण लहरी जी का वंशज भी रहता है.

about Lahiri Mahasaya, and scriptural commentaries
ये शिला उनके समाधी के पास लगी हुयी जब भी बनारस जाये जाना न भूले.

आज भी क्रिया योग की किताब जो की श्यामाचरण लहरी ने अपने हाथो से ‘जो की महावतार बाबा जी से सुनकर लिखी थी’ उसके कुछ पन्ने वहाँ मोजूद है. लहरी जी का उनके जीवन काल में कभी फोटोग्राफ लेना संभव नहीं हो पाया क्युकी महावतार बाबा जी से मिलने के बाद लहरी जी के शरीर काफी कुछ परिवर्तन हो गया था और कोई भी कैमरा उनकी फोटो नहीं निकाल पाया, लेकिन फिर भी आज उनकी केवल एक ही तस्वीर उपलव्ध है जिसकी अनुमति उन्होंने स्वयं दी थी.

श्यामाचरण लाहिड़ी का एकमात्र असली चित्र जो की उनकी अनुमति से ही लिया जा सका
श्यामाचरण लाहिड़ी का एकमात्र असली चित्र जो की उनकी अनुमति से ही लिया जा सका

वर्तमान में पूना के गुरुनाथ भी महावतार बाबा जी से कई बार मिले चुके है और उन्होंने तो महावतार बाबा जी पर एक किताब भी लिखी है जिसका नाम “The Lightning Standing Still” है जो आज भी amazon.in वेबसाइट पर उपलव्ध है.

दक्षिण भारत के श्री एम् जो महावातर बाबा जी से हिमालय की चोटियों में कई बार मिल चुके है.कर्जत के दादा जी श्री ज्यो महावतार बाबा जी को आज भी मिलते है. और वो ये भी बताते है की आज बाबा जी कैसे दिखते है. और उनके बताये गए अनुसार माहवार बाबा जी का एक बार फिर से चित्र बनाया गया, आपको फिर से विश्वास नहीं होगा की श्यामाचरण लहरी द्वारा बनवाया चित्र में बाबा जी की उम्र और आज के चित्र में बाबा जी उम्र सामान ही प्रतीत होती है.

सन् 1954 में बद्रीनाथ स्थित अपने आश्रम में 6 महीने की अवधि में बाबाजी ने अपने एक महान भक्त एस. ए. ए. रमैय्या को समूर्ण 144 क्रिया की दीक्षा दी जिसमे आसन, प्राणायाम, ध्यान, मंत्र एवं भक्ति के व्यवहारिक तकनीक सम्मिलित हैं |

क्रिया योग से जुडी आवश्यक जानकारियाँ जो आपको पता होनी चाहिए : 

क्रिया योग क्या है ?
प्राचीन भारत में क्रिया योग भली भांति जाना जाता था, लेकिन अंत में यह खो गया, जिसका कारण था पुरोहित गोपनीयता और मनुष्य की उदासीनता। क्रियायोग की विधि केवल दीक्षित साधकों को ही बताई जाती है। यह विधि पूर्णतया शास्त्रोक्त है और गीता उसकी कुंजी है। गीता में कर्म, ज्ञान, सांख्य इत्यादि सभी योग है और वह भी इतने सहज रूप में जिसमें जाति और धर्म के बंधन बाधक नहीं होते। योगानन्द जी का कहना है कि भगवान कृष्ण ने भगवद गीता में क्रिया योग को संदर्भित किया है:

भगवान श्री कृष्ण क्रिया योग का जिक्र करते हैं जब “भगवान कृष्ण यह बताते है कि उन्होंने ही अपने पूर्व अवतार में अविनाशी योग की जानकारी एक प्राचीन प्रबुद्ध, वैवस्वत को दी जिन्होंने इसे महान व्यवस्थापक मनु को संप्रेषित किया। इसके बाद उन्होंने, यह ज्ञान भारत के सूर्य वंशी साम्राज्य के जनक इक्ष्वाकु को प्रदान किया।

पतंजलि का इशारा भी योग क्रिया की ओर ही था जब उन्होंने लिखा “क्रिया योग शारीरिक अनुशासन, मानसिक नियंत्रण और पर ध्यान केंद्रित करने से निर्मित है।”

बाबाजी का क्रिया योग ईश्वर-बोध, यथार्थ-ज्ञान एवं आत्म-साक्षात्कार प्राप्त करने की एक वैज्ञानिक प्रणाली है | प्राचीन सिद्ध परम्परा के 18 सिद्धों की शिक्षा का संश्लेषण कर भारत के एक महान विभूति बाबाजी  ने इस प्रणाली को पुनर्जीवित किया | इसमें योग के विभिन्न क्रियाओं को 5 भागों में बांटा गया है |

  1. क्रिया हठ योग: इसमें विश्राम के आसन, बंध और मुद्रा सम्मिलित हैं | इनसे नाङी एवं चक्र जागरण के साथ-साथ उत्तम स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है | बाबाजी ने 18 आसनों की एक श्रृंखला तैयार की है जिन्हें दो आसन के युगल में करना सिखाया जाता है | अपने शारीर की देख-भाल मात्र शारीर के लिए नहीं बल्कि इसे ईश्वर का वाहन अथवा मंदिर समझ कर किया जाता है |
  2. क्रिया कुण्डलिनी प्राणायाम: यह व्यक्ति की सुप्त चेतना एवं शक्ति को जगा कर उसे मेरुदंड के मूल से शीर्ष तक स्थित 7 प्रमुख चक्रों में प्रवाहित करने की शक्तिशाली स्व्शन क्रिया है | यह 7 चक्रों से सम्बद्ध क्षमताओं को जागृत कर अस्तित्व के पांचों कोषों को शक्तिपुंज में परिणत करते है |
  3. क्रिया ध्यान योग: यह ध्यान की विभिन्न पद्धतियों से मन को वश में करने, अवचेतन मन की शुद्धि, एकाग्रता का विकास, मानसिक स्पष्टता एवं दूरदर्शिता, बौधिक, सहज ज्ञान तथा सृजनात्मक क्षमताओं की वृद्धि और ईश्वर के साथ समागम अर्थात समाधि एवं आत्म-ज्ञान को क्रमशः प्राप्त करने की एक वैज्ञानिक प्रणाली है |
  4. क्रिया मंत्र योग: सूक्ष्म ध्वनि के मौन मानसिक जप से सहज ज्ञान, बुद्धि एवं चक्र जागृत होते हैं | मंत्र मन में निरंतर चलते हुए कोलाहल का स्थान ले लेता है एवं अथाशक्ति संचय को आसान बनाता है | मंत्र के जप से मन की अवचेतन प्रवृत्तियों की शुद्धि होती है |
  5. क्रिया भक्ति योग: आत्मा की ईश्वर प्राप्ति की अभीप्सा को उर्वरित करता है | इसमें मंत्रोच्चार, कीर्तन, पूजा, यज्ञ एवं तीर्थ यात्रा के साथ-साथ निष्काम सेवा सम्मिलित है | इनसे अपेक्षारहित प्रेम एवं आनंद की अनुभूति होती है | धीरे-धीरे साधक के सभी कार्य मधुर एवं प्रेममय हो जाते हैं और उसे सब में अपने प्रियतम का दर्शन होता है |

क्रिया योग की उत्पत्ति :

इस परम्परा का प्रारंभ शिव योग के पारंगत सिद्ध योगियों ने किया | वैसे इसका वर्णन महाभारत में भी मिलता जब श्री कृष्ण गीता का उपदेश अर्जुन को दे रहे थे. सिद्ध अगस्त्य और सिद्ध बोगनाथ की शिक्षाओं को संश्लेषित कर क्रिया बाबाजी  ने क्रिया योग के वर्तमान रूप का गठन किया | हिमालय पर्वत पर स्थित बद्रीनाथ में सन् 1954 और 1955 में बाबाजी ने महान योगी एस. ए. ए. रमय्या को इस तकनीक की दीक्षा दी |

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