जरूर जाए प्रकति की गोद में बसे बारह ज्योतिर्लिंगों के उद्गम स्थल जागेश्वर मंदिर

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उत्तराखंड के प्रमुख देवस्थलो में “जागेश्वर धाम या मंदिर” प्रसिद्ध तीर्थ स्थान है | यह उत्तराखंड का सबसे बड़ा मंदिर समूह है | यह मंदिर कुमाउं मंडल के अल्मोड़ा जिले से 38 किलोमीटर की दुरी पर देवदार के जंगलो के बीच में स्थित है | जागेश्वर को उत्तराखंड का “पाँचवा धाम” भी कहा जाता है | जागेश्वर मंदिर में 124 मंदिरों का समूह है | जिसमे 4-5 मंदिर प्रमुख है जिनमे विधि के अनुसार पूजा होती है | जागेश्वर धाम मे सारे मंदिर समूह केदारनाथ शैली से निर्मित हैं | जागेश्वर अपनी वास्तुकला के लिए काफी विख्यात है। बड़े-बड़े पत्थरों से निर्मित ये विशाल मंदिर बहुत ही सुन्दर हैं। । यह मंदिर प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर है,मतलब आपको लगेगा जैसे आप प्रकृति की गोद में आ बैठे है. यह ज्योतिलिंग “आठवा” ज्योतिलिंग माना जाता है | इसे “योगेश्वर” के नाम से भी जाना जाता है। ऋगवेद में ‘नागेशं दारुकावने” के नाम से इसका उल्लेख मिलता है। महाभारत में भी इसका वर्णन है । पुराणों के अनुसार शिवजी तथा सप्तऋषियों ने यहां तपस्या की थी।
स्कन्द पुराण के मानस खण्ड में जागेश्वर ज्योतिर्लिंग की व्याख्या की गयी है। इस पुस्तिका के अनुसार 8वां. ज्योतिर्लिंग, नागेश, दरुक वन में स्थित है। यह नाम देवदार वृक्ष पर आधारित है जो इस मंदिर के चारों ओर फैले हुए हैं। इस मंदिर के आसपास से एक छोटी नदी बहती है – जटा गंगा अर्थात् शिव की जटाओं से निकलती गंगा।

कहा जाता है कि प्राचीन समय में जागेश्वर मंदिर में मांगी गई मन्नतें उसी रूप में स्वीकार हो जाती थीं जिसका भारी दुरुपयोग हो रहा था। आठवीं सदी में आदि शंकराचार्य जागेश्वर आए और उन्होंने महामृत्युंजय में स्थापित शिवलिंग को कीलित करके इस दुरुपयोग को रोकने की व्यवस्था की। शंकराचार्य जी द्वारा कीलित किए जाने के बाद से अब यहां दूसरों के लिए बुरी कामना करने वालों की मनोकामनाएंपूरी नहीं होती केवल यज्ञ एवं अनुष्ठान से मंगलकारी मनोकामनाएं ही पूरी हो सकती हैं।

जागेश्वर के इतिहास के अनुसार उत्तरभारत में गुप्त साम्राज्य के दौरान हिमालय की पहाडियों के कुमाउं क्षेत्र में कत्युरीराजा था | जागेश्वर मंदिर का निर्माण भी उसी काल में हुआ | इसी वजह से मंदिरों में गुप्त साम्राज्य की झलक दिखाई देती है | मंदिर के निर्माण की अवधि को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा तीन कालो में बाटा गया है “कत्युरीकाल , उत्तर कत्युरिकाल एवम् चंद्रकाल” | अपनी अनोखी कलाकृति से इन साहसी राजाओं ने देवदार के घने जंगल के मध्य बने जागेश्वर मंदिर का ही नहीं बल्कि अल्मोड़ा जिले में 400 सौ से अधिक मंदिरों का निर्माण किया है |

जिसमे से जागेश्वर में ही लगभग 124 छोटे-बड़े मंदिर है | मंदिरों का निर्माण लकड़ी तथा सीमेंट के जगह पर पत्थरो की बड़ी-बड़ी स्लैब से किया गया है | दरवाज़े की चौखटे देवी-देवताओ की प्रतिमाओं से चिन्हित है | जागेश्वर को पुराणों में “हाटकेश्वर” और भू-राजस्व लेख में “पट्टी-पारुण” के नाम से जाना जाता है जो भगवान् शिव को उनके लिंग रूप में समर्पित हैं। हालांकि प्रत्येक मन्दिर के भिन्न भिन्न नाम हैं।

कहते है जागेश्वर मंदिर भगवान् शिव का पहला शिव लिंग मंदिर है. और यही से बारह ज्योतिर्लिंगों का उदगम हुआ है. वैसे तो इसके ज्यादातर मंदिर अब एकांत में है जहाँ बहुत कम लोग जाते है, लेकिन इसके चार-पांच मंदिरों में आज भी नित्य पूजा-अर्चना होती है। श्रावण महीने को छोड़कर इस मंदिर में आने वालों की संख्या अपेक्षाकृत कम रहती है, जबकि श्रावण के महीने में भारी संख्या में यहां लोग आते हैं। द्वादश ज्योतिर्लिंग में एक घोषित होने के बावजूद इस मंदिर की सबसे बडी महत्ता यह है कि यहीं से लिंग के रूप में भगवान शिव की पूजा शुरू हुई थी। कहते है ये मंदिर चार धाम की यात्रा के मार्ग में पड़ता है जो लोग पहले चार धाम की यात्रा पर जाते थे वो यही से दर्शन करके आगे बढ़ते थे. इसलिए पहले चार धाम नहीं बल्कि पांच धाम की यात्रा होती थी. जागेश्वर मतलब योगेश्वर मंदिर का जिक्र चीनी यात्री हुआन त्सांग ने भी अपनी यात्रा संस्मरण में किया है।

प्राचीन मान्यता के अनुसार जागेश्वर धाम भगवान शिव की तपस्थली है | यहाँ नव दुर्गा ,सूर्य, हमुमान जी, कालिका, कालेश्वर प्रमुख हैं | हर वर्ष श्रावण मास में पूरे महीने जागेश्वर धाम में पर्व चलता है । पूरे देश से श्रद्धालु इस धाम के दर्शन के लिए आते है | इस स्थान में कर्मकांड, जप, पार्थिव पूजन आदि चलता है । यहाँ विदेशी पर्यटक भी खूब आते हैं । जागेश्वर मंदिर में हिन्दुओं के सभी बड़े देवी-देवताओं के मंदिर हैं । दो मंदिर विशेष हैं पहला “शिव” और दूसरा शिव के “महामृत्युंजय रूप” का । महामृत्युंजय में जप आदि करने से मृत्यु तुल्य कष्ट भी टल जाता है । 8वी ओर 10वी शताब्दी मे निर्मित इस मंदिर समूहों का निर्माण कत्यूरी राजाओ ने करवाया था परन्तु लोग मानते हैं कि मंदिर को पांडवों ने बनवाया था। लेकिन इतिहासकार मानते हैं कि इन्हें कत्यूरी और चंद शासकों ने बनवाया था । इस स्थल के मुख्य मंदिरों में दन्देश्वर मंदिर, चंडी-का-मंदिर, कुबेर मंदिर, मिर्त्युजय मंदिर , नौ दुर्गा, नवा-गिरह मंदिर, एक पिरामिड मंदिर और सूर्य मंदिर शामिल हैं।महामंडल मंदिर,महादेव मंदिर का सबसे बड़ा मंदिर है, जबकि दन्देश्वर मंदिर जागेश्वर का सबसे बड़ा मंदिर है।

ज्यादातर मंदिरों का निर्माण कत्युरी राजवंश के शासकों ने करवाया था, जिन्होंने यहाँ 7वीं.ई. से 14वीं.ई. तक राज किया। तत्पश्चात इन मदिरों की देखभाल की चन्द्रवंशी शासकों ने जिन्होंने 15वी. से 18वी. शताब्दी तक यहाँ शासन किया। मंदिर के शिलालेखों में मल्ला राजाओं का भी उल्लेख है।

कुछ महत्वपूर्ण जानकारियां:

Jageshwar temple timings :

अगर आप जागेश्वर धाम में किसी महोत्सव के दिन जाना चाहते है तो शिव रात्रि और श्रावण बिलकुल सही समय है. वैसे तो आप यहाँ कभी भी जा सकते है क्युकी ये अल्मोड़ा से ज्यादा दूर नहीं है

Jageshwar Dham Temperature or Weather :

जैसा की आपको बताया की जागेश्वर धाम अल्मोड़ा शहर के पास ही है तो वहाँ का तापमान और मौसम अल्मोड़ा के समान ही रहता है. पहाड़ी क्षेत्र है जरुरी सावधानी जरूर बरते है जैसे की सूर्य की रौशनी में ही जाए और रौशनी में ही आये.

Jageshwar Dham hotels:

Main Bazar, Kausani 18.3 km from Jageshwar Dham
Almora 263601, 19.3 km from Jageshwar Dham
Binsar Road | near Kasaar Devi Temple, Almora
Binsar Road, Binsar 16.0 km from Jageshwar Dham

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