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भक्तिकाल मध्यकाल (प्रथम)

भक्तिकाल का उदय –

भक्ति काल (1350 ई0 से 1650 ई0 तक ). – हिंदी साहित्य का भक्ति काल मध्य भाग का प्रारम्भिक भाग है |  संक्षेप में भक्ति-युग की चार प्रमुख काव्य-धाराएं मिलती हैं :

1 – सगुण भक्ति

A – रामाश्रयी शाखा –

भक्तिकाल रामाश्रयी शाखा के कवि –

इस शाखा में अन्य कोई कवि तुलसीदास के सम। न उल्लेखनीय नहीं है तथापि अग्रदास, नाभादास तथा प्राण चन्द चौहान भी इस श्रेणी में आते हैं।

B- कृष्णाश्रयी शाखा –

भक्तिकाल कृष्णाश्रयी शाखा के कवि –

भक्तिकाल में कृष्णभक्ति शाखा (कृष्णाश्रयी शाखा) के अंतर्गत आने वाले प्रमुख कवि हैं – कबीरदास, संत शिरोमणि रविदास,तुलसीदास, सूरदास, नंददास, कृष्णदास, परमानंद दास, कुंभनदास, चतुर्भुजदास, छीतस्वामी, गोविन्दस्वामी, हितहरिवंश, गदाधर भट्ट, मीराबाई, स्वामी हरिदास, सूरदास मदनमोहन, श्रीभट्ट, व्यास जी, रसखान, ध्रुवदास तथा चैतन्य महाप्रभु।

2 – निर्गुण भक्ति

A – ज्ञानाश्रयी शाखा –

भक्तिकाल में ज्ञानाश्रयी शाखा के कवि –

इन संतों में प्रमुख कबीरदास थे। अन्य मुख्य संत-कवियों के नाम हैं – नानक, रैदास, दादूदयाल, सुंदरदास तथा मलूकदास।

B – प्रेमाश्रयी शाखा –

भक्तिकाल में प्रेमाश्रयी शाखा के कवि –

इन कवियों में मलिक मुहम्मद जायसी प्रमुख हैं। आपका ‘पद्मावत’ महाकाव्य इस शैली की सर्वश्रेष्ठ रचना है। अन्य कवियों में प्रमुख हैं – मंझन, कुतुबन और उसमान।

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