आज हम आपको प्राचीनकाल के उन महान ऋषि-मुनियों के बारे में बताने जा रहे है जिन्होंने अपने जीवनकाल में बहुत से अद्भुत काम किए और अनेक पवित्र ग्रंथो की रचना भी की है| इन ऋषि-मुनियों के नाम इतिहास में सदा के लिए अमर हो गए है|

वैसे तो हमारा देश ऋषि-मुनियों से भरा पड़ा है लेकिन हम आपको सबसे प्रथम ऋषि-मुनियों के बारे में बता रहे है जो कि आज भी भगवान की तरह पूजे जाते है और इनके नाम से बड़े-बड़े मंदिर बने है|

तो दोस्तों आइए देखते है कि वे ऋषि-मुनि कौन-कौन थे|

वैदिक ऋषियों के नाम / प्राचीन ऋषि मुनियों के नाम –

देवर्षि नारद –

देवर्षि नारद के जन्म के पीछे एक कथा है जो इस प्रकार है कि एक बार ब्रहमाजी की सभा में सभी देवता व गंधर्व भगवान का भजन करने के लिए आये| तो उस सभा में नारदजी भी अपनी स्त्रियों के साथ गये क्योंकि पहले वे एक गंधर्व थे| जब उस सभा में नारदजी परिहास करने लगे तो ब्रहमाजी को गुस्सा आ गया और उन्होंने नारदजी को शुद्र होने का श्राप दे दिया| इस कारण नारदजी का जन्म शुद्र कुल में हुआ था| जन्म लेने के बाद ही इनके पिता की मृत्यु हो गई और उनकी माता नारदजी के भरण-पोषण के लिए दासी का काम करने लगी| एक बार उनके गांव में कुछ महात्मा आए तो नारदजी ने सच्चे मन से उनकी बहुत सेवा की ,जिसके कारण उनके पूर्व जन्म के श्राप का प्रभाव खत्म हो गया| नारदजी जब 5 साल के थे तो सांप के काटने से उनकी माता का निधन हो गया| इसके बाद नारदजी भगवान का भजन करने लगे और भगवान का ध्यान करते-करते नारदजी ने अपना पूरा जीवन काट दिया|

नारदजी कल्प के अंत में ब्रहमाजी के मानस पुत्र के रूप में अवतीर्ण हुए| देवर्षि नारद भगवान के भक्तों में सर्वश्रेष्ठ है| ये भगवान की भक्ति व माहात्म्य के विस्तार के लिए अपनी वीणा की मधुर तान पर भगवद्गुणों का गान करते हुए निरंतर विचरण किया करते है| इन्हें भगवान का मन कहा जाता है|

महर्षि वाल्मीकि –

महर्षि वाल्मीकि का जन्म ब्राह्मण कुल में हुआ था| पहले इनका नाम रत्नाकर था| वाल्मीकि ऋषि बनाने से पहले एक डकैत थे| वे लूट-पाट व हत्या करके अपने परिवार का पालन-पोषण करते थे| लेकिन एक दिन उनकी मुलाकात देवर्षि नारद से हुई| तो नारदजी ने उनके ज्ञाननेत्र खोल दिए और वे एक डकैत से महर्षि वाल्मीकि बन गए|

वाल्मीकि आगे चलकर लौकिक छंदों के आदि कवि बने और उन्होंने हिन्दुओं के सबसे पवित्र ग्रन्थ ‘रामचरित्र मानस ‘की रचना की| इतना ही नहीं वनवास के समय भगवान श्रीराम ने उन्हें स्वयं दर्शन दिए| सीता माता ने अपने वनवास का अंतिम समय इनके आश्रम में व्यतीत किया और आश्रम में ही लव-कुश का जन्म हुआ|

महर्षि दधीचि –

लोगों के कल्याण के लिए आत्मत्याग करने वाले महर्षि दधीचि को कौन नहीं जानता, जो कि तपस्या और पवित्रता की प्रतिमूर्ति थे| इनकी माता का नाम शांति व पिता का नाम अथर्वा ऋषि था| इनकी वैराग्य व शिवभक्ति में अटूट निष्ठा थी|

महर्षि दधीचि ने वृत्रासुर को मारने के लिए अपनी हड्डियों को इंद्र को दान में दे दिया था| दधीचि की हड्डियों से ही वज्र का निर्माण किया गया और इस वज्र से वृत्रासुर को मारा गया| इंद्र के सिहासन को बचाने और जनकल्याण के लिए दधीचि ने अपने शरीर का आत्मत्याग कर दिया था|

भगवान व्यास ऋषि –

भगवान व्यास नारायण के कलावतार थे| इनके पिता का नाम पराशर ऋषि व माता का नाम सत्यवती था| बचपन में ही व्यास ने अपने माता-पिता से जंगल में जाकर तपस्या करने की इच्छा व्यक्त की लेकिन उनकी माता ने उन्हें जाने से रोकने की कोशिश की लेकिन व्यास की इच्छा शक्ति के आगे उनकी माता को झुकना पड़ा और वे माता की आज्ञा लेकर जंगल तपस्या के लिए चले गए|

व्यास ने सम्पूर्ण वेद ,पुराण ,इतिहास और परमात्मतत्व का ज्ञान प्राप्त किया| मनुष्यों की आयु को क्षीण होते देख ,उन्होंने वेदों का विस्तार किया इसलिए वे वेद व्यास के नाम से प्रसिद्ध हुए| वेदव्यास ने ‘महाभारत ,अष्टादश पुराण और श्रीमद्भगवतगीता जैसे ग्रंथो की रचना की|

महात्मा शुकदेव –

महात्मा शुकदेव महर्षि वेदव्यासजी के पुत्र थे| शुकदेवजी के जन्म से संबंधित अनेक कथाये प्रचलित है| उनमे से एक यह है कि एक बार शिवजी माता पार्वती को अमर कथा सुना रहे थे| लेकिन माता पार्वती कथा सुनते-सुनते ही सो गई और उनकी जगह एक शुक ने हुंकारी भरना शुरू कर दिया| जब भगवान शिव को यह बात पता चली तो उन्होंने उस शुक को मारने के लिए उसका पीछा किया | तो वह शुक वेदव्यास के आश्रम में आकर उनकी पत्नी के मुख में सूक्ष्म रूप धारण करके घुस गया| यही शुक बाद में व्यासजी के घर पुत्र बनकर पैदा हुआ| तभी शुकदेव को गर्भ में ही वेद ,उपनिषद ,दर्शन और पुराण आदि का ज्ञान प्राप्त हो गया था| महात्मा शुकदेव ने महाभारत के युद्ध के पहले ही अपने शरीर का त्याग कर दिया था|

आदि गुरु शंकराचार्य –

शंकराचार्यजी का जन्म 788 ई. में केरल के कालडी नामक गांव में हुआ था| उनके पिता का नाम श्रीशिवगुरु तथा माता का सुभद्राजी था| उनके माता-पिता ने भगवान शिवजी की कठोर तपस्या के बाद शंकराचार्य को प्राप्त किया था| इसलिए शंकराचार्य को भगवान शिव का अवतार माना जाता था| शंकराचार्य ने सात वर्ष की आयु में ही सम्पूर्ण वेद-शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त कर लिया था| इसके बाद उन्होंने गुरु गोविन्दभगवत्पाद से सन्यास की दीक्षा ली और वे अल्प आयु में ही सन्यासी बन गए|

आदि गुरु शंकराचार्य ने सबसे प्रसिद्ध चार मठो (वेदांत मठ ,गोवर्धन मठ ,शारदा मठ व ज्योतिपीठ मठ) की स्थापना की| इसके अलावा उनके द्वारा रचित प्रमुख ग्रन्थ ब्रह्मसूत्र-भाष्य ,उपनिषद्-भाष्य ,गीता-भाष्य ,पंचदशी आदि है|  आदि गुरु शंकराचार्य केवल 32 वर्ष की आयु में ही इस संसार से अंतरध्यान हो गए| वे जब तक रहे तब तक उन्होंने सम्पूर्ण मानव-जाती का कल्याण किया|

श्रीरामानुजाचार्य –

इनका जन्म तमिलनाडु के श्रीपेरंबदूर ग्राम में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था| इनके पिता का नाम केशव भट्ट था| इन्होने काशी में यादव प्रकाश नामक गुरु से वेदों का अध्ययन सीखा| श्रीरामानुजाचार्य बड़े ही विद्वान ,सदाचारी ,धैर्यवान व उदार थे| चरित्रबल और भक्ति में तो ये अद्वितीय थे|

श्रीरामानुजाचार्य गृहस्थ थे लेकिन अपने गुरु श्रीयामुनाचार्य की आखरी इच्छा ( उनके गुरु श्रीरामानुजाचार्य के माध्यम से ब्रह्मसूत्र ,विष्णुसहस्रनाम और अलवन्दारो के दिव्य प्रबंध का टीका कराना चाहते थे) की पूर्ति के लिए ,उन्होंने अपने गृहस्थ जीवन को त्याग दिया और सन्यासी बन गए| उन्होंने भक्ति मार्ग का प्रचार करने के लिए सम्पूर्ण भारत की यात्रा की और भक्तिमार्ग के समर्थन में गीता व ब्रहमसूत्र भाष्य लिखा| वेदांतसूत्रों पर लिखा गया इनका भाष्य श्रीभाष्य के नाम से प्रसिद्ध हुआ| इन्होने अपने एक सौ बीस साल के जीवनकाल  में संसार के सभी लोगों भक्तिमार्ग पर चलने की शिक्षा दी|

श्रीनिम्बार्काचार्य –

इन्हें भगवान सूर्य का अवतार माना जाता है| इनके पिता का नाम श्रीअरुण मुनि व माता का नाम जयंती देवी था| इनका जन्म दक्षिण भारत के गोदावरी नदी के तट पर स्थित वैदूर्यपत्तन के निकट अरुणा आश्रम में हुआ था|

श्रीनिम्बार्काचार्य ने अनेक ग्रंथो का प्रणयन किया किन्तु वर्तमान में वेदांत-पारिजात सौरभ के नाम से वेदांत-सूत्रों का भाष्य ही सुलभ है| इनके सम्प्रदाय में राधा-कृष्ण की पूजा होती है क्योंकि श्रीमद्भगवत इस सम्प्रदाय का प्रधान ग्रन्थ है|

श्रीवल्लभाचार्य –

इनका जन्म विक्रम संवत 1535 ,वैशाखी कृष्ण एकादशी को काशी के चम्प-अरण्य में हुआ| जिस समय इनका जन्म हुआ उस समय उनके पिता सोमयज्ञ की पूर्णाहुति पर काशी में एक लाख ब्राह्मणों को भोजन कराने जा रहे थे ,उसी समय रास्ते में चम्प-अरण्य में श्रीवल्लभाचार्य का जन्म हुआ| इनकी माता का नाम इलम्मा और पिता का नाम श्रीलक्ष्मी भट्ट था| इन्हें अग्निदेव का अवतार माना जाता है| ग्यारह वर्ष की आयु में ही इन्होने वेद ,उपनिषद् ,व्याकरण आदि का ज्ञान प्राप्त कर लिया था|

श्रीवल्लभाचार्य के प्रमुख ग्रन्थ – अणुभाष्य ,यमुनाष्टक ,पंचश्लोकी ,पत्रावलंबन आदि|

श्रीमध्वाचार्य –

इनका जन्म विक्रम संवत 1295 की माघ शुक्ल सप्तमी के दिन तमिलनाडु के मंगलूर जिले के बेलली ग्राम में हुआ था| इनके पिता का नाम श्रीनारायण भट्ट और माता का नाम श्रीमती वेदवती था| इन्हें वायुदेव का अवतार माना जाता था| इन्होने 11 वर्ष की आयु में ही श्रीअच्युतपक्षाचार्य से सन्यास की दीक्षा ली थी|

श्रीमध्वाचार्य की प्रमुख रचनाये – यमकभारतम ,उपाधिखंडनं ,महाभारततात्पर्यनिर्णयम ,कथालक्षणं आदि|

ये सब वे ऋषि-मुनि है, जिन्होंने हमारे जीवन का आधार रखा है| हमारे जीवन को दिशा और ज्ञान प्रदान किया है| इनके द्वारा लिखे गये ग्रंथों को आजीवन सभी लोग पढ़ते रहेंगे और उनका अनुसरण करेंगे|

महावतार बाबा जी जो आज भी जीवित है 5000 वर्षो से – अदभुत