जरुर जाने ! किस दिशा में पैर करके नहीं सोना चाहिए?

आज हम पता करेंगे की किस दिशा में सिर एवं किस दिशा में पैर करके सोना चाहिए. और इससे आपको क्या क्या लाभ होंगे. ये तथ्य वैज्ञानिक, वास्तुशास्त्र, भारतीय पुराणों से लिए गए है.

The great Indian Vastu Shastra and Chinese Feng shui systems describe favorable and unfavorable geographical directions (north, south, east, west) for sleeping, everybody should must know about it.

वैज्ञानिक तथ्य :
पूर्व या दक्षिण दिशा की ओर सिर करके सोना विज्ञान सम्मत प्रक्रिया है जो आपको अनेक बीमारियों से दूर रखती है। सौर मंडल धनात्मक और ऋणात्मक धु्रव पर आधारित है। धनात्मक ध्रुव के आकर्षण से दक्षिण से उत्तर दिशा की ओर प्रगतिशील विद्युत प्रवाह या चुम्किया प्रवाह हमारे सिर में प्रवेश करता है और पैरों के रास्ते निकल जाता है।
वैसे आपने अपने स्कूल के समय आपने विज्ञानं में जरुर पढ़ा होगा की वातावरण में भी चुम्बकीय शक्ति होती है, ये शक्ति दक्षिण से उत्तर दिशा की ओर बहती रहती है. जब हम दक्षिण दिशा की ओर सिर करके सोते हैं, तो यह ऊर्जा हमारे सिर से प्रवेश करती है और पैरों के रास्ते बाहर निकल जाती है. इस क्रिया से भोजन आसानी से पच जाता है.

कई शोधों से पता चला है कि साधारण चुंबक शरीर से बांधने पर वह हमारे शरीर के ऊत्तकों पर विपरीत प्रभाव डालता है. इसी सिद्धांत पर यह निष्कर्ष भी निकाला गया कि अगर साधारण चुंबक हमारे शरीर पर विपरीत प्रभाव डाल सकता है, तो उत्तरी पोल पर प्राकृतिक चुम्बक भी हमारे मन, मस्तिष्क व संपूर्ण शरीर पर विपरीत असर डाल सकता है और डालता भी है. यही वजह है कि उत्तर दिशा की ओर सिर रखकर सोना निषेध माना गया है.

दरअसल, हमारे / मानव सिर में धनात्मक ऊर्जा का प्रवाह है, जबकि पैरों से ऋणात्मक ऊर्जा का निकास होता रहता है. यदि हम अपने सिर को उत्तर दिशा की ओर रखेंगे, तो उत्तर की धनात्मक और सिर की धनात्मक तरंग एक दूसरे से विपरित भागेगी, जिससे हमारे मस्तिष्क में बेचैनी बढ़ जाएगी और फिर नींद अच्छे से नहीं आएगी. इससे व्यक्ति की शारीरिक ऊर्जा का क्षय हो जाता है और वह जब सुबह उठता है तो थकान महसूस करता है, जबकि दक्षिण में सिर रखकर सोने से ऐसा कुछ नहीं होता।

हालांकि, हिंदू शास्त्रों और वास्तुविदों के अनुसार भी उत्तर दिशा में सोना अनुचित माना गया है

किस दिशा में पैर करके नहीं सोना चाहिए

दिशा की जानकारी

वास्तुशास्त्र में उत्तर दिशा का महत्त्व :
वास्तु शास्त्र घर, दूकान, भवन अथवा मन्दिर निर्मान करने का प्राचीन भारतीय विज्ञान है। वास्तुशास्त्र में उत्तर, दक्षिण, पूरब और पश्चिम चार मूल दिशाएं हैं। इन चार दिशाओं के अलावा 4 अर्थात ईशान, आग्नेय, नैऋत्य और वायव्य विदिशाएं हैं। आकाश और पाताल को भी इसमें दिशा स्वरूप शामिल किया गया है। इस प्रकार चार दिशा, चार विदिशा और आकाश पाताल को जोड़कर इस विज्ञान में दिशाओं की संख्या कुल दस माना गया है।
वास्तु के अनुसार पश्चिम दिशा में सिर करके सोना बहुत उचित है इससे आपके जीवन में पद, प्रतिष्ठा, सम्मान और समृध्दी की बद्दोत्तरी होती है.
वास्तु के अनुसार दक्षिण में भी सिर को रखकर सोना शुभ माना गया है. क्युकी मानव शरीर में सिर धनात्मक होता है और पैर ऋणात्मक होते है, उत्तर दिशा भी धनात्मक होती है तो ऋणात्मक और धनात्मक के मिलने से आपके शरीर की ऊर्जा सिर से लेकर पैर तक सही से बहती है. इससे आपके जीवन में पद, प्रतिष्ठा, सम्मान और समृध्दी तो मिलाती ही है साथ साथ वैज्ञानिक कारणों से आपको नीद भी बहुत अच्छी आती है.

वास्तु के अनुसार उत्तर दिशा को सबसे शुभ दिशा माना गया है, वास्तुशास्त्र में उत्तर दिशा के स्वामी कुबेर हैं. ऐसे में इस दिशा में सही निर्माण आपके घर को समृद्धि और खुशियों से भर सकता है.
वास्तु के अनुसार उत्तर दिशा सबसे हलकी दिशा या पृथ्वी की ऊपरी दिशा होती जहा से आपको पॉजिटिव ऊर्जा या प्रकाश आता है.
सोने के तीन से चार घंटे पूर्व जल और अन्य का त्याग कर देना चाहिए। शास्त्र अनुसार संध्याकाल बितने के बाद भोजन नहीं करना चाहिए।
वास्तुशास्त्र के अनुसार सोने के लिए दक्षिण-पश्चिम क्षेत्र भी बहुत उचित होता है. क्युकी वास्तु के हिसाब से ये सबसे शक्तिशाली चतुर्भुज है जहाँ सकारात्मक ऊर्जा सबसे ज्यादा संगृहीत रहती है.
अगर आपकी आर्थिक स्थिति सही नहीं है तो पश्चिम दिशा की और मुख करके भोजन करे.

भारतीय पुराणों में उत्तर दिशा का महत्त्व:
भारतीय पुराणों में भी उत्तर दिशा का बहुत महत्त्व जिन्हें हम कुछ विन्दुयो में समझ सकते है.
उत्तर दिशा में हिमालय पर्वत है जिस पर यात्रा करते करते पांडव स्वर्ग गये थे.
उत्तर दिशा में ही शिव जी कैलाश पर्वत पर बैठे है जो दक्षिण की तरफ मुख करके संसार को देख रहे है.
भारतीय पुराणों की पूजनीय नदियाँ भी उत्तर दिशा से निकल कर दक्षिण की और बहती है.
उत्तर दिशा में ही धुर्व तारा विद्यमान रहता है जो अपनी जगह से नहीं हटता एवं प्राचीन समय में ध्रुव तारा के माध्यम से ही मार्ग खोजते थे और दिशायो का ज्ञान प्राप्त करते थे.
उत्तर दिशा में ही देव-भूमि यानि उत्तराखंड जहाँ हमारे सारे देवी देवता निवास करते है.
पश्चिम दिशा में भी सिर रखकर नहीं सोते हैं क्योंकि तब हमारे पैर पूर्व दिशा की ओर होंगे जो कि शास्त्रों के अनुसार अनुचित और अशुभ माने जाते हैं। पूर्व में सूर्य की ऊर्जा का प्रवाह भी होता है और पूर्व में देव-देवताओं का निवास स्थान भी माना गया है। सनातन धर्म में सूर्य को जीवनदाता और देवता माना गया है. ऐसे में सूर्य के निकलने की दिशा में पैर करना उचित नहीं माना जा सकता. इस वजह से पूरब की ओर सिर रखा जा सकता है.

मान्यता के हिसाब से :
एक प्रचलित मान्यता है कि जब कोई इंसान मर जाता है, तो उसके शव को उत्तर दिशा की ओर सिर के साथ रखा जाता है.
दक्षिण की ओर पांव केवल मृत व्यक्ति के ही किये जाते हैं. मरते समय उत्तर की ओर सिर करके उतारने की रीति इसी नियम पर है, भूमि बिजली को शीघ्र खींच लेती है और प्राण सुगमता से निकल जाते है.

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