क्या आपका डॉक्टर या हॉस्पिटल आपको लूट रहा है?

क्या आपका डॉक्टर या हॉस्पिटल आपको लूट रहा है?

Huge scam of higher printing of MRP on medicines

आखिर कैसे भारत में दवाइयों का धंधा किया जाता है, वैसे एक मरीज़. दवाइयों में अपनी जान, सुख और चैन देखता है और धंधा करने वाले लोग… पैसा. आज में इसी बात को तीन चरणों में बतायुंगा ताकि आपको समझ में आ सके की ये धंधा शुरू कैसे होता है, इसे चलाने वाले कोन है और वो लूटते कैसे है.
पहला चरण :
अगर आपके पास 2-10 लाख रुपये है तो आप आसानी से दवाइया बनाने का काम कर सकते है. सबसे पहले ये देखना होगा की मार्किट में सबसे ज्यादा बिकने वाली या सबसे महँगी बिकने वाली दवाइया कोन सी है. आप इन दवाइयों की लिस्ट बनाये अब आप किसी दवाई बनाने वाली फैक्ट्री से मिल सकते है जिसका अपना लाइसेंस नंबर हो. उससे आप कहे की आप कुछ दवाइयों को अपने ब्रांड के नाम से बेचना चाहते है, जब आप ज्यादा से ज्यादा मात्रा में दवाइया बनाने का आर्डर देते है तो वो तुरुन्त राजी भी हो जाते है. अब आपके पास अपनी दवाइयों का ब्रांड नाम है, आपकी अपनी एमआरपी है, जो दवाई मार्किट में रुपये 100 की मिलती है उसे आप 800 रूपए में बेंच कर ज्यादा से ज्यादा धन कमाना चाहते है.

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(अपने देखा होगा कुछ दवाइयों में मैन्युफैक्चरिंग कंपनी का नाम अलग होता है, जिसमे उसका लाइसेंस नंबर दिया जाता है, लेकिन मार्केटिंग बाय कंपनी का नाम अलग होता है. )

दूसरा चरण :
जब कोई कंपनी दवाइया बनवाकर अपना पैसा फसाती है तो उसके दिमाग में मरीज़ नहीं होता, उसको सिर्फ और सिर्फ ग्राहक दिखाई देता है और उस कंपनी के मार्केटिंग सदस्य देश भर के डॉक्टर्स के पास घूमते है और उन्हें लालच देते है जैसे दिवाली पर देर सारे गिफ्ट, हॉलिडे पैकेजेस, २०% से भी ज्यादा कमिशन आदि आदि, उसके बदले में डॉक्टर्स को अपने ज्यादातर या हर मरीज़ को उसी कंपनी की दवाइया लिखनी होती है बस.
100 में 99 डॉक्टर्स इस लालच में आ भी जाते है, फिर भारत में चलता है वही दलाली वाला काम.फिर क्या गरीब और क्या अमीर.

जो दवाई उसी मैन्युफैक्चरिंग कंपनी की 100 रुपये में उपलब्ध होती है वही दवाई डॉक्टर अपने लालच के लिए 8०० रुपये वाली लिखता है. जो आदमी 100-200 रुपये में ठीक हो सकता है वही आदमी मरीज़ की जगह पर ग्राहक बन जाता है, उसे 800 रुपये खर्च करने पड़ते है जिसमे 20% डॉक्टर का हिस्सा होता है 25% मेडिकल स्टोर का, 10% मेडिसिन डिस्ट्रीब्यूटर का आदि आदि.

तीसरा चरण :
ये आज की नयी बदलती दुनिया का नया तरीका है …क्या एक अच्छे हॉस्पिटल को अपना खुद का मेडिकल खोलने की अनुमति देनी चाहिए?? मतलब ये हॉस्पिटल उसी मैन्युफैक्चरिंग कंपनी के पास जाते है और अपने अलग ही ब्रांड और एमआरपी पर दवाइया बनवाते है, और आप नोट करेंगे की वो दवाइया एक्सक्लूसिव उसी हॉस्पिटल के मेडिकल पर ही मिलती है. वही 100 रुपये वाली दवाई आपको इन महंगे हॉस्पिटल के मेडिकल पर 1500 रुपये तक की मिलती है.
कैसे पहचाने की आपके साथ फ्रॉड हो रहा है.
आप अपने डॉक्टर ( चाहे वो बड़े से बड़े हॉस्पिटल का हो या छोटे हॉस्पिटल का ) से कहे की दवाइयों लिखने वाली पर्चे पर ये भी लिख दे की अगर वो ब्रांड न मिले तो कोई और दे दे. मतलब डॉक्टर अपने दवाई वाले पर्चे पर केमिस्ट को substitute दवाई देने की अनुमति प्रदान करे..अगर आपका डॉक्टर ऐसा करना से मना करता है तो आप समझो डॉक्टर के पास नहीं …एक बिज़नेस मैन के पास खड़े हो ….खिसक लेने में भी भलाई है और ये बात दुसरो को भी बताये.

अगर आपके डॉक्टर ने केमिस्ट को substitute दवाई देने के लिए लिख दिया है तो आप एक या एक से अधिक केमिस्ट के पास जाकर उसी दवाई का अलग अलग ब्रांड्स में रेट ले सकते है और कम से कम दाम में खरीद भी सकते है. बस डॉक्टर या उसके कंपाउंडर को दवाई चेक कराना न भूले, आपका डॉक्टर ईमानदार व्यक्ति है वो चेक करने के बाद ही आपको खाने की अनुमति देगा.

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